आज एक परीक्षा केंद्र के बाहर अपनी बेटी का इंतजार कर रही थी ।नियत समय पर परीक्षा छूटी तो बच्चे एक-एक करके बाहर निकले ।कुछ प्रशन्नचित तो कुछ मायूस ,कुछ दो नंबर गलत होने के दुख में तो कोई सिर्फ पास होने के लिए संघर्षरत ।एक-एक बच्चे के मनोभावों को पढ़ रही थी मैं और उनके मनोभावों से पता चल रहा था उनके माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं का। कोई बेटे को पीछे बिठाकर स्कूटर को गुस्से में पैडल मार रहा था तो कोई जोर से कार का दरवाजा बंद कर रहा था ।कुछ बच्चे जिनके माता-पिता अभी नहीं पहुंचे थे, कह रहे थे” यार आज तो मैं गया !ग्रामर के दो क्वेश्चन गलत हो गए पता नहीं क्या होगा “,और एक ने तो हद ही कर दी मुझे नहीं पता वह माता थी या उस बच्चे की शिक्षिका लेकिन जिस प्रकार से वह उस बच्चे को डांट रही थी मेरा मन बैठ गया उनके शब्द कुछ इस प्रकार से थे कि “तुम ऐसे कैसे कर सकते हो !!!ग्रामर ही तो वह पोर्शन है जिसमें बच्चे स्कोर कर सकते हैं। तुमने तो लुटिया डूबा दी इतने दिन से मैं तुम्हारे साथ ग्रामर को लेकर मेहनत कर रही थी कुछ तो ख्याल किया होता! कुछ तो ध्यान दिया होता!!” और भी न जाने क्या-क्या उनके एक-एक शब्द नस्तर जैसे चुभ रहे थे ।वह बच्चा मायूस होकर चुपचाप सावधान की स्थिति में खड़ा था ,उसके मनोभाव मुझे ऐसे प्रतीत होते थे जैसे कह रहा हो की धरती फट पड़े और मैं इसके अंदर समा जाऊं।
मेरी माता-पिता से अपील है बहुत कुछ है जीवन में जो बच्चे कर सकते हैं ।कृपया बच्चों को डांटे नहीं, बिल्कुल पढ़ने के लिए कहे उन्हें सपने दिखाये लेकिन उनके आंखों के सपनों को ना मरने दें ।हर बच्चा एक समान नहीं हो सकता उनके लिए दया भाव रखें। जो अच्छा कर रहे हैं उनको शुभकामनाएं दें और जो बच्चे अच्छा नहीं कर पा रहे हैं एकेडमिक में उनके जीवन के नए अवसर तलासें। हो सकता है वह किसी और फील्ड में बहुत अच्छा कर सकते हों। एक बार अपने बच्चों के पास बैठे और उसे बोलें कि कोई फर्क नहीं पड़ता तुम फेल भी हो गए तो, जीवन बहुत बड़ा है और यह एक छोटा सा पन्ना। आप देखोगे कि उसकी आंखों में एक नई चमक आ गई है और शायद फिर वह जीवन में कभी फेल ही ना हो
आगे भी अनुभव शेयर करूंगी

विभा पोखरियाल नौडियाल

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